तब हमहूं खेती करत रहेन …..

सेयर गर्नुहोस

“अवधी कविता “


जब आलू घुइया लहसुन अव
पियाज से कोठरी भरत रहेन
है आजिव हमका याद भय
तब हमहूं खेती करत रहेन ,

कोहड़ा लउंकी सेम तरोई
घर घर छपरप फरत रहा
झखरक लिहे सहारा कबौ
करैला टटियप चढत रहा
लाय कै घूरेस खाद हम देशी
थाल्हा थाल्हप धरत रहेन
है आजिव हमका याद……….

छीछालेदर बथुआ अव
चौरैया जैसन साग रहा
भांटा अउ मिरचा चार पिंयड
तब नलौक नगीचे लाग रहा
तब हमहूं पानी दीन रहा
जब नादा गाइक् भरत रहेन
है आजिव हमका याद………..

हम छोड़ दीन तब लागत है
अस दुनिया खेती छोड़ दिहिस
गांवन पय हंसै बजार लाग
छूछै अब घरका मोड़ दिहिस
तरकारी पहुंची आसमान
काल्हिन अकबारेम् पढत रहेन
है आजिव हमका याद भाय
तब हमहूं खेती करत रहेन ..!!

( संजय अवधी, गोंडा ,भारत )

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